
नई दिल्ली: अटल, आडवाणी रुपी वट वृक्ष की छत्रछाया में पली बढी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इस वर्ष अलग छवि के लोकप्रिय नेता नरेंद्र मोदी के इर्द गिर्द सिमट गई। मोदी के नेतृत्व में पार्टी ने लोकसभा चुनाव का सफर शुरू किया लेकिन उनके कारण वर्षों पुराने सहयोगी जनता दल यू से नाता टूट गया। भाजपा के लिए यह साल बेहद उठापटक वाला रहा और अध्यक्ष से लेकर लोकसभा चुनाव में नेतृत्व के मुद्दे पर उहापोह की स्थिति बनी। लोकसभा चुनाव में नेतृत्व के मुद्दे पर पार्टी के फैसले का विरोध करते हुए शीर्ष नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने सभी पदों से इस्तीफा देकर पार्टी को झटका दिया हालांकि बाद में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दबाव में अपना फैसला वापस ले लिया। पार्टी ने गुजरात के बाद मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ में भी लगातार तीसरी बार सरकार बनाकर वहां अपनी जमीन मजबूत की।
मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाये जाने के विरोध में भाजपा के सत्रह वर्ष पुराने सहयोगी जनता दल यू ने नाता तोड़ दिया। इससे भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) गिने चुने दलों का गठजोड बनकर रह गया। लेकिन शिरोमणि अकाली दल भाजपा के सबसे विश्वसनीय सहयोगी के रूप में उभर कर सामने आया। तमाम आंतरिक संघर्षों से जूझते हुए आखिरकार मोदी के नेतृत्व में एकजुट होना तथा लोकसभा चुनाव के लिए मतभेदों से ऊपर उठकर संगठित होना भी भाजपा की बडी उपलब्धि रही। वर्ष 2002 के गुजरात दंगा मामले में निचली अदालत से मोदी को क्लीन चिट मिलने से भाजपा ने बड़ी राहत मिल गई। साथ ही पार्टी ने एक लड़की की जासूसी से संबंधित मामले की जांच के लिए आयोग गठित करने के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ कानूनी लड़ाई लडऩे का एलान करके कांग्रेस के खिलाफ नया मोर्चा खोलने का संकेत दे दिया।
भाजपा को पहला झटका झारखंड में लगा जहां झारखंड मुक्ति मोर्चा के हाथ खींचने पर उसे सरकार गंवानी पड़ी। मई में कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भी उसे करारी हार का सामना करना पड़ा लेकिन मोदी के राष्ट्रीय परि²श्य में आने और पक्ष में बने माहौल का लाभ उसे चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में मिला। वर्ष के अंत में हुए इन चुनावों में पार्टी ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ में हैट्रिक लगाई। राजस्थान में उसने कांग्रेस से न केवल सत्ता छीनी बल्कि उसे अब तक की सबसे करारी शिकस्त दी। दिल्ली में भी वह सबसे बडी पार्टी बनकर उभरी लेकिन सरकार बनाने के बहुमत से पीछे रह गई। भाजपा की बागडोर एक बार फिर किसान नेता राजनाथ सिंह को सौंपी गई। तीन वर्षों से पार्टी की बागडोर संभाल रहे नितिन गडकरी को दोबारा यह जिम्मेदारी सौंपी जानी तय थी। इसके लिए पार्टी के संविधान में संशोधन भी किया गया था लेकिन गडकरी को भ्रष्टाचार के आरोपों और आडवाणी के विरोध के कारण अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा। गडकरी के हटते ही भाजपा ने नया रूख अख्तियार कर लिया।
मोदी को संगठन की सर्वोच्च संस्था केन्द्रीय संसदीय बोर्ड में शामिल कर पार्टी ने इस दिशा में पहला कदम रखा। पिछले दस वर्षों से केन्द्र की सत्ता से दूर रही पार्टी ने समझ लिया कि अब वह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम और शीर्ष नेता लाल कृष्ण आडवाणी के सहारे आगे नहीं बढ सकती और मोदी में उसे देश के सिंहासन तक पहुंचाने का जज्बा तथा करिश्मा है। भाजपा ने मोदी के नेतृत्व में पुरानी सोच और रणनीति से आगे निकलकर नई सोच, नई उम्मीद के साथ नया सफर शुरु किया और हाल में हुए चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में मिली शानदार सफलता ने मंजिल हासिल करने के उसके विश्वास को पुख्ता किया है। समूची पार्टी और कार्यकर्ता उनके पीछे लामबंद हैं और मोदी की रैलियों में उमड़ रही भारी भीड इस बात को साबित भी करती है।
मोदी को सर्वमान्य नेता के तौर पर स्थापित करने का पार्टी का निर्णय आसान नहीं रहा हालाकि इसमें उसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पूरा साथ मिला। जून में गोवा कार्यकारिणी में मोदी को पार्टी की चुनाव अभियान समिति का मुखिया बनाये जाने के कारण आडवाणी ने बैठक में भाग नहीं लिया और सभी पदों से इस्तीफा देकर इस फैसले का कड़ा विरोध किया। मोदी की लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में ताजपोशी के लिए भी पार्टी को काफी मशक्कत करनी पड़ी। आडवाणी ने इसे लेकर एक बार फिर कड़ा विरोध दर्ज कराया और इस फैसले पर मुहर लगाने के लिए हुई संसदीय बोर्ड की बैठक में हिस्सा नहीं लिया। उन्होंने समय समय पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी मोदी के समकक्ष खड़ा करने की असफल कोशिश की।
